NewsMPG – Breaking News, Local News & Latest Updates India & : सीधी बात& तीखी बात https://newsmpg.com/rss/category/aबेबाक-राय,-ज़रूरी-सवाल-–-पढ़ें-आज-की-तीखी-बात NewsMPG – Breaking News, Local News & Latest Updates India & : सीधी बात& तीखी बात en Copyright 2023 Newsmpg.com All Rights Reserved :: WebMaster : Harsh Shukla हरी झंडी दिखाकर रतलाम में शव वाहन रवाना: ये संवेदना है या उसका अंतिम संस्कार! https://newsmpg.com/ratlam-shav-vahan-flag-off-event-criticism https://newsmpg.com/ratlam-shav-vahan-flag-off-event-criticism - अदिति मिश्रा, रतलाम।
शहर को आखिरकार एक ऐतिहासिक उपलब्धि मिल ही गई — दो शव वाहन! इस सुनहरी उपलब्धि को मनाने के लिए बाकायदा समारोह हुआ। हरी झंडी लहराई गई, अधिकारी मुस्कराए, और शव वाहनों को रवाना किया गया जैसे कोई प्रचार रथ निकल रहा हो।
बुधवार को जिला अस्पताल के परिसर में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संध्या बेलसरे ने खुद हाथ में हरी झंडी थाम कर शव वाहनों को विदा किया। विडंबना देखिए जो डॉक्टर जिÞंदगियाँ बचाने के लिए नियुक्त हैं, वे आज लाशों के वाहन को झंडी दिखाकर रवाना कर रहे थे। वो भी मुस्कान के साथ। इनके साथ ही वो ठेकेदार भी मौजूद रहे जो ये वाहनों को चलाएंगे। 

हालांकि जो भी इन वाहनों का इस्तेमाल करेगा, वह जीवन के सबसे दु:खद पल में होगा। कोई खुशी-खुशी इन वाहनों में नहीं बैठेगा, कोई सेल्फी नहीं लेगा, कोई ताली नहीं बजाएगा।

शव वाहन एक अदद जरूर

यह सच है कि जब शव वाहन एक जरूरत है। मुश्किल में दूरस्थ अंचलों से अपने परिवार, मित्रों को लेकर आस में व्यक्ति अस्पतालों तक आता है, पैसा भी लगाता है, मजदूरी छोड़ता है। लेकिन अपनों की सांस टूटते ही बहुत कुछ टूट जाता है। भारी मन और खाली जेब के साथ गरीब के लिए शव को वापस घर ले जाना सबसे बड़ी सजा है। ये शव वाहन ऐसे लोगों के लिए सुविधा बनेंगे। संभवतः जिले में इनके आने पर संवेदनाओं से भरी सूचना जारी होनी थी की वाहन दुःख में कुछ तो मरहम बनेंगे, लेकिन जिस प्रकार का आयोजन किया गया वह संवेदनाओं का मखौल है। 

सीएमएचओ के अनुमोदन से ही मिलेगा वाहन

विभाग द्वारा बताया गया कि शासकीय स्वास्थ्य संस्था सिविल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अथवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर मरीज के भर्ती रहने के दौरान होने वाली मृत्यु के मामलों में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से अनुमोदन प्राप्त कर शव वाहन उपलब्ध कराया जाएगा। प्रत्येक प्रकरण में शव वाहन का उपयोग करने के लिए वाहन चालक के समक्ष संबंधित व्यक्ति की मृत्यु का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना आवश्यक रहेगा।  

निजी से या जिले के बाहर नहीं मिलेगी सुविधा

सीएमएचओ डॉ संध्या बेलसरे ने बताया कि योजना का मुख्य उद्देश्य सभी शासकीय अस्पतालों में रोगी अथवा दुर्घटना पीड़ितों की इलाज के दौरान मृत्यु होने पर मृतक को सम्मान पूर्वक अपने परिजनों को सुपुर्द कर नि:शुल्क उनके निवास स्थल तक पहुंचाना है। अभी प्राप्त शव वाहनों में से एक शव वाहन का लोकेशन जिला चिकित्सालय रतलाम और दूसरे शव वाहन का लोकेशन डॉ लक्ष्मी नारायण पांडेय मेडिकल कॉलेज रतलाम निर्धारित किया गया है। जिले की सीमा के अंदर उनके घर तक ही छोड़ा जाएगा। निजी चिकित्सालय के लिए सुविधा नहीं मिलेगी। 

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Wed, 30 Jul 2025 18:32:03 +0530 newsmpg
"रतलाम की सड़कें" और  "मौत का कुआं"  https://newsmpg.com/The-roads-of-Ratlam-and-well-of-death-have-become-synonyms https://newsmpg.com/The-roads-of-Ratlam-and-well-of-death-have-become-synonyms

"मौत के कुंए" और रतलाम की सड़कों पर गाड़ी चलाने में बहुत सी समानताएं है। दोनों की तुलना की जाए तो उन्नीस बीस का फर्क होगा बल्कि रतलाम की सड़कों का सफर बीस ही साबित होगा।

मौत का कुआं मतलब मेले, ठेलों में लकड़ी के पाटों को जोड़कर एक बड़ा सा कुआं बनाया जाता है। कोई लड़का या लड़की बाइक या कार से साहस भरे स्टंट दिखाते हैं। कुएं में फरार्टे भरती इन गाड़ी के करतब देखने के लिए मौत के कुएं का मालिक टिकिट बेचकर पैसा वसूलता है। रोंगटे खड़े कर देने वाले स्टंट देख दर्शक दांतो तले उंगली दबा लेते हैं। मौत वाले कुंए में बाइक या कार स्टार्ट करने के बाद खतरा ही खतरा होता है। उसमे गाड़ी चलाने वाले शख्स की जरा सी चूक से वो उसका आखरी शो हो सकता है।

रतलाम की सड़को पर बिना टिकिट के आपको ये करतब यानि स्टंट रोज, लगभग हर गली, मोहल्ले और मुख्य सड़क पर देखने और करने को मिलता है। यहां गाड़ी स्टार्ट करते ही आपके साहस और शौर्य की परीक्षा शुरू हो जाती है। मौत वाले कुएं में एक या दो लोग अपनी गाड़ियों से करतब करते है लेकिन रतलामी सड़को पर सैंकड़ो लोग एक साथ मौत के कुंए से भी भयानक करतब करते हैं। यहां "उंगली दांतो तले नही दबती, बल्कि पैरों तले से जमीन ही खिसक जाती है ।"

ये तो रोज की बात है

पें- पें, पौं- पौं के कोलाहल के बीच कौन सा करतब-बाज किधर से प्रकट हो जाए पता नही होता। बाइक, स्कूटी और बाइक वाले तो करतब दिखाते ही हैं, आटो, मैजिक, कार, जीप, ट्रैक्टर, बस और ट्रक भी रैंगती दौड़ में भागने की कोशिश में लगे रहते हैं। कभी इधर से कट, कभी उधर से डाइव, वाहनों की भीड़ में से पतली सी गली ढूंढना और फिर टेढ़े मेढे होकर अपनी बाइक निकल लेना, मां कसम ऐसा लगता है जैसे कोई युद्ध जीत कर अगले मोर्चे के लिए निकल गए हो।

चार पहिया वाले तो करतब करते हांफते ही रहते हैं। रतलाम की चौड़ी लेकिन अतिक्रमण और बेतरतीब यातायात युक्त सड़को पर कार-जीप चलाने में पारगंत कार चालकों का हौंसला देखने लायक होता है।  उनकी फुतीर्ली आंखे आगे के साथ दाएं- बाएं पीछे तक देखती रहती है। रतलाम में केवल बाएं चलने वाले नियम पर लोगों को कम ही विश्वास है इसलिए कब किधर से कोई ओवरटेक कर बाइक-स्कूटी वाला या वाली उनकी बगल से निकल जाएगा, उसका ख्याल  चालक को ही रख कर तत्काल ब्रेक लगाना पड़ता है। ऐसा ध्यान नही रखा और नजर चूकी तो दो पहिया वाले के गिरने से लेकर उसे और खुद को हुए नुकसान का वहन भी बिना गलती के उसे करना ही होता है।

उसके बाद भी दो -चार "कठोर वाक्य" जो आपके कान न सुनना चाहे वो भी दनदनाते हुए कानो से टकराते हैं। यहां अगर वाक्यों का आदान प्रदान बढ़ जाए तो आगे घूंसा, मुक्का, जूता भी धनधना सकता है। 

बकरा पंहुचा कसाईखाने

गड्ढे ,आवारा पशु और बीच मे रैली /जुलूस आ जाए तो इनसे पार पाने के लिए अतिरिक्त विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। ऐसे समय मे अपने गुस्से को काबू रखना ही बड़ा साहस का काम है , "ये धैर्य और शौर्य का सयुंक्त उपक्रम होता है।" यदि कोई महिला, बुजुर्ग या नव चालक चार पहिया लेकर राममंदिर ,शहर सराय ,तोपखाना, चौमुखीपुल और कस्तूरबा नगर मेंन रोड़ जैसे इलाके में  घुस जाए तो उसकी हालत ऐसी होती है, जैसे कोई बकरा गलती से कसाईखाने में पहुंच गया हो। जो काम वो पैदल ही 30 मिनिट में ही पूरा कर सकता था, उसके लिए उसके 2 घण्टे कब निकल जाएंगे, पता नही चलेगा। 

ये  रतलामी साहस है

खैर साहब "रतलाम के साहस का बखान तो इतिहास में दर्ज है।" प्राचीन काल मे राजा रतन सिंह ने शाहजंहा के दरबार मे पागल हाथी को काबू में कर लिया था। ऐसे में आधुनिक काल की उनकी प्रजा भी अपने साहस का प्रदर्शन कर रतलाम के" बेकाबू ट्रैफिक"  में अपना वाहन और खुद को भी काबू में रखने का काम तो कर ही सकती है।

नोट - विनम्र अपील है कि रतलाम के जिम्मेदार इसे पढ़कर न दूसरे के माथे गलती मढ़ें, न अपना माथा फोड़े, बल्कि रतलाम की जनता को मौत के कुएं से बाहर निकालें। 

-मुकेशपुरी गोस्वामी 
लेखक - पत्रकार और रतलाम प्रेस क्लब के अध्यक्ष है

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Sun, 17 Nov 2024 15:14:47 +0530 newsmpg
 राहुल गांधी भारत जोड़ने आए थे, कांग्रेसियों और प्रशंसकों का दिल तोड़कर चले गए ! ऐसा क्या हुआ राहुल के दौरे में ? न्यूजएमपीजी की खरी&खरी  https://newsmpg.com/Rahul-Gandhi-came-to-unite-India-but-broke-hearts-of-his-fans-and-congress-followers-know-why-is-the-mob-really-unhappy-with-his-recent-visit https://newsmpg.com/Rahul-Gandhi-came-to-unite-India-but-broke-hearts-of-his-fans-and-congress-followers-know-why-is-the-mob-really-unhappy-with-his-recent-visit
Editorial Desk @newsmpg. 
भारत जोड़ो न्याय यात्रा लेकर राहुल गांधी रतलाम जिले में आए । न्याय यात्रा में राहुल गांधी का पूरा जोर प्रदेश की चौबीस प्रतिशत आदिवासी जनसंख्या पर रहा। उन्होने अपने हर भाषण में आदिवासी राष्ट्रपति के राममंदिर में नही दिखने को उनका अपमान भी बताया। रतलाम जिले में उन्ही आदिवासियों  का अपमान खुद राहुल जाने -अनजाने में कर गए। ये शायद उन्हे कांग्रेस का कोई बड़ा नेता नहीं बता रहा लेकिन हर निष्ठावान कांग्रेसी और राजनैतिक समीक्षक यही चर्चा कर रहे हैं।

रतलाम शहर मे दिए 11 मिनिट के भाषण में उन्होने करीब नौ मिनिट ओबीसी और आदिवासियों , बेरोजगारो के लिए बात की। उन्हे असली भारत माता बताते हुए नरेन्द्र मोदी द्वारा एक प्रतिशत लोगो की जय बोलने का आक्षेप भी किया। इसके बाद उन्होने जो किया , इससे उनकी बदले हुए परिपक्व  नेता की बजाय अख्खड़ और बिगडेल राजकुमार की छवि ही पुख्ता हुई। राहुल गांधी की हरकत से ये कहीं नही लगा कि वे कोई चुनाव जीतना जाहते है। रतलाम -झाबुआ आदिवासी बाहुल्य मतदाता वाली आरक्षित सीट है। मोदी लहर को छोड़ दे तो कांग्रेस की पांरपरिक सीट रही है। भाजपा की जीत का अंतर भी यहां कोई बहुत बड़ा नही है , ऐसे में इस सीट को वापिस कांग्रेस हर हाल में वापिस चाहती है लेकिन शायद राहुल गांधी नहीं !

ऐसा क्या किया राहुल ने ?
राहुल गांधी करीब तीन घंटे की देरी से रतलाम पहुंचे तो कांग्रेसी बेहद उत्साह में थे। शहरवासी भी राहुल क्या बोलते है , रतलाम में इसको लेकर उत्सुक थे। राहुल गांधी ने शहर से जुड़ने के लिए , यहां की संस्कृति, धार्मिक, व्यापारिक, राजैनतिक विरासत , परंपरा पर एक शब्द नही बोला। वो वहीं बोलते रहे जो वो पूरी यात्रा के दौरान या आजकल रैलियों में बालते है। जिसे लोग टीवी या सोशल मीडिया के बारे में सुनते आ रहे है। रतलाम में फव्वारा चौक मे नुक्कड़ सभा के बाद करीब तीन किलोमीटर का मार्ग रोड़ शो करते हुए पार करना था। विधानसभा चुनाव में हार के बाद हताश कांग्रेसियों में नया जोश आया तो था लेकिन राहुल ने उस पर पानी फेर दिया। राहुल गांधी सभा करने के सौ मीटर बाद ही अपनी गाड़ी में बैठ गए ,जबकि जिले भर से आए कांग्रेसियों ने अलग -अलग मंच बनाकर उनका स्वागत करने की तैयारी की थी। राहुल का काफिला तेज गति से निकल गया और जमीनी स्तर पर सत्ता का मुकाबला करने वाला, लाठिया खाने और मुकदमें झेलने वाला आम कार्यकर्ता राहुल की एक झलक पाने के लिए मुंह ताकता रह गया। 


ये भी आदिवासियों का अपमान ही है राहुल !
रतलाम से राहुल गांधी का काफिला सैलाना पहुंचा। यहां के रोड़ शो पर पूरे मालवा की निगाहे थी। करीब दस हजार की संख्या में आदिवासी कार्यकर्ता राहुल का घंटो इंतजार करते रहे। जब राहुल पहुंचे तो तेज गति से निकल गए। यहां पर उन्हे आदिवासियों के मसीहा के रूप में माने जाने वाले पूर्व मंत्री स्वर्गीय प्रभूदयाल गेहलोत की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर रोड़ शो की शुरूआत करते हुए  राजवाड़ा चौक में सभा को संबोधित करना था। इसके लिए सैलाना में व्यापक तैयारिया की गई थी। सारी तैयारिया धरी की धरी रह गई जब राहुल गांधी ने स्वर्गीय गेहलोत की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने की बजाय जीप में से ही उन्हे नमन किया। तेज गति के वाहन से हाथ हिलाते हुए बिना सभा संबोधित किए रात्रि पड़ाव स्थल सरवन की तरफ रवाना हो गए। यहां उनके साथ जीप में पूर्व विधायक हर्ष विजय गेहलोत भी सवार थे लेकिन वे सरवन से बिना राहुल के कैंप में गए वापिस लौट गए। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह उन्हे मनाकर वापिस लेकर सरवन गए। हजारों आदिवासियों को बिना संबोधित कर , उनसे बिना मिले जाने को लेकर ही लोग इसे आदिवासियों का अपमान बता रहे है। हांलाकि कांग्रेसी बोल रहे है ऐसी कोई बात नहीं है।

कांग्रेस का मिस मैनेजमेंट भी जिम्मेदार
कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता के आगमन के दौरान पूरे समय  कांग्रेस नेताओ का मिस मैनेजमेंट सामने आया। इसको लेकर अब सवाल उठ रहे है। सभा में उम्मीद से कम भीड़ , संचालन, माईक का बंद होना ,स्थानीय नेताओ में आपस में समन्वय नहीं होने से रतलाम शहर अध्यक्ष खुद को साबित नहीं कर पाए। इसके अलावा ऐसी कई बाद स्थिति बनी की कांग्रेस का मैनेजमेंट हंसी का पात्र बना। प्रदेश के नेताओ , यात्रा प्रभारी और स्थानीय नेताओ में कोई तालमेल नजर नही आया। इसी का परिणाम ये रहा कि वे राहुल गांधी को रतलाम की सीट का महत्व, रोड़ शो में गाड़ी में बैठने की बजाय खड़े रह कर कार्यकर्ताओ का उत्साह बढ़ाने की बात तक नही बता पाए। रात्रि पड़ाव स्थल सरवन में जिला कांग्रेस अध्यक्ष को घंटो बाहर बैेठ कर अपने आप को कैंप में जाने के लिए जद्दोजहद करते देखा गया। इस तरह का मिस मैनेजमेंट लगभग हर जगह रहा । ऐसे आलम में कांग्रेस के नेता लोकसभा चुनाव जीतने के दावे कर रहे है तो क्यों कर रहे है ये आत्ममुग्ध कांग्रेसी खुद ही बता सकते है?

- - एमपी गोस्वामी, रतलाम 
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं आलोचक हैं तथा विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिकाओं में कार्य करने के साथ लंबा अनुभव रखते हैं।) 

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Fri, 08 Mar 2024 16:11:40 +0530 newsmpg
&रिजल्ट का पोस्टमार्टम& चैप्टर & 3& संघ, संगठन और सादगी से हासिल हुई सत्ता  & कांग्रेस नहीं कर पाई एक भी कमी को कवर, भाजपा ने नहीं दिया एक भी मौका  https://newsmpg.com/Power-achieved-through-union-organization-and-simplicity--Congress-could-not-cover-even-a-single-deficiency-BJP-did-not-give-even-a-single-chance https://newsmpg.com/Power-achieved-through-union-organization-and-simplicity--Congress-could-not-cover-even-a-single-deficiency-BJP-did-not-give-even-a-single-chance
Research Desk @newsmpg.com । पोस्ट ग्रेजुएट अधिकारी, डॉक्टर और ठेठ ग्रामीण के बीच की लड़ाई के रूप में सामने आई रतलाम ग्रामीण विधानसभा की चुनावी बिसात ने भी भाजपा को ही बढ़त दिलवाई। यहां भी त्रिकोणीय मुकाबला रहा, लेकिन दो भारी पलड़ों में भाजपा और कांग्रेस ही रही। आदिवासी रिजर्व इस सीट का इतिहास भी कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ रहा है। ऐसे में इस बार यहां क्या फैक्टर बने और बिगड़े इसे लेकर राजनैतिक विश्लेषकों के अलग-अलग मत हैं। 
रतलाम ग्रामीण सीट भी जिले की उन चुनिंदा सीटों में हैं जहां कांग्रेस ने आसानी से भाजपा के वर्चस्व को टक्कर दी है। पिछले चुनाव (2018) में भीतरघात का शिकार हुई कांग्रेस ने बहुत थोड़े अंतर से सीट गंवाई थी। ऐसे में इस बार यहां के स्थानीय नेताओं को पूरी उम्मीद थी कि कांग्रेस से टिकट सही मिलने पर यह सीट इस बार कांग्रेस की होगी। दूसरी ओर भाजपा ने पिछली  बार कड़े मुकाबले में भी सीट पर जीत दर्ज की थी। इस बार शिक्षक से विधायक बने दिलीप मकवाना की रिपोर्ट कार्ड में प्रोगेस गिरती दिखते ही भाजपा भी चिंता में आ गई थी। गिरते ग्राफ को संभालने के लिए भाजपा ने चुनाव के 6 महीने पहले से प्रयास शुरु कर दिए थे। इसका खासा असर नहीं दिखा तो दावेदारों के बीच रस्साकसी को रोकते हुए 2013 में 26969 वोटों से कांग्रेस की मौजूदा विधायक लक्ष्मीदेवी खराड़ी को हराने वाले मथुरालाल डामर को फिर से मैदान में उतारा गया। 

विद्रोह को संभालने की कोशिश भी नहीं...

इस सीट पर कांग्रेस का टिकट घोषित होने के पहले ही गुटबाजी चरम पर आ गई थी। यहां एक महिला नेत्री, निर्दलीय लड़ने वाले डॉ. अभय ओहरी, किशन सिंगाड़, राजीव देवदा समेत दावेदार 6 महीनों से भोपाल के साथ पूरी विधानसभा में भी सक्रिय थे। माना जा रहा था कि या तो पिछली बार फ्रैक्चर और भीतरघात का शिकार हुए थावर भूरिया या इन्हीं चार में से किसी 1 को टिकट मिल सकता है। लक्ष्मणसिंह डिंडोर के इस्तीफे को कोर्ट से हरीझंडी मिलते ही पिक्चर बदलने लगी  और एन वक्त पर टिकट उन्हें मिला। इसके बाद से ही स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने खुलकर उनका विरोध करते हुए पुतले तक जलाए। इतना होने पर भी जावरा की तरह यहां टिकट बदलने की कोई कवायद नहीं हुई, न ही बागियो को ठीक से साधने की। आला कमान ने फोन लगाकर खुल कर विरोध नहीं करने की नसीहत तो दे डाली लेकिन भाजपा की तरह यहां काडर या अनुशासन का उतना महत्व नहीं होने से कार्यकर्ताओं के मन को पार्टी नहीं बदल सकी। 

तेज हुई शुरुआत, लेकिन बीच में पड़ी धीमी रफ्तार 

कांग्रेस का प्रचार शुरु हुआ तो रफ्तार अच्छी रही, लेकिन चुनाव संचालन में अनुभव की कमी साफ दिखी। प्रचार के गांव और रूट अटपटे होने से तय समय में सभी गांव कवर नहीं हुए। बीच के समय में सोशल मीडिया मैनेजमेंट से लेकर कार्यकर्ताओं के भ्रमण और अन्य समाजों के साथ बैठके कम होने लगी। हालांकि अंत में फिर पटरी पर लाने की कोशिश हुई, लेकिन तब तक चिड़िया खेत चुग गई थी। दूसरी ओर निर्दलीय प्रत्याशी ने भी जयस और अन्य संगठनों के साथ शुरुआत अच्छी की, लेकिन बीच में आते-आते यहां भी संचालन में कोई तय लाईन-लैंथ नहीं होने और प्लान आॅफ एक्शन मजबूत नहीं होने से टीम कमजोर होती गई। 

दूसरे बिछाते बिसात, उसके पहले जीत लिया आधा मुकाबला 

भाजपा के लिए इस सीट पर संघ ने करीब 3 महीने पहले से पार्टी के लिए मेहनत शुरु कर दी थी। अनुशांगिक संगठनों के साथ ही यहां धार, मंदसौर और महाराष्ट्र से आई टीमों ने घर-घर खासकर महिला वोटरों से एप्रौच साधने में शुरुआत में ही खेल जीत लिया। जब तक दूसरे प्रत्याशी बिसात बिछाते, तब तक भाजपा लाड़लियों और राष्ट्रवाद से प्रेरित युवाओं को साध चुकी थी। मथुरालाल डामर की सादगी और उनके प्रति लोगों की सिम्पैथी को भी भाजपा ने भी पूरी तरह भुनाया। नतीजा यही रहा कि भाजपा ने बिना किसी संशय के सीट को अपने नाम एक बार फिर से करते हुए हैट्रिक बना ली। 

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Fri, 08 Dec 2023 18:53:14 +0530 newsmpg