खोखली हो रही नर्मदा का घट रहा जल स्तर, बड़वानी को ही नहीं मिल रहा पानी - मेधा पाटकर  

Renowned environmentalist and founder member of Narmada Bachao Andolan Medha Patkar says Water level of Narmada is getting hollow, illegal mining and over exploitation will destroy the valley as well as the river

Jul 6, 2023 - 15:40
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खोखली हो रही नर्मदा का घट रहा जल स्तर, बड़वानी को ही नहीं मिल रहा पानी - मेधा पाटकर  
medha patkar

पिछले कुछ महीनों से नर्मदा को मातेसरी मानने वाली, पूजने वाली, परिक्रमावासियों का स्वागत, सम्मान करने वाली बड़वानी जैसे शहर की जनता हैरान है। नर्मदा से 5 किलोमीटर दूर शहर में भी परेशानी होने लगी है। कुछ दिनों से अलग-अलग समूह जल के लिए तड़पते और आवाज उठाते रहे हैं। पिछले 37 सालों से आंदोलनकारी जो चेतावनी दे रहे हैं, वो अब जनता समझ चुकी है। 
बड़वानी, नर्मदा घाटी के अनेक शहरों में से एक है। यह शहर भी नर्मदा के पानी पर जीता रहा है, पानी लेता रहा है पीने, सिंचाई और हर कार्य के लिए। शहरवासी अन्न से लेकर श्रमिकों के श्रम तक, हर अपरिहार्य पूंजी और वस्तुएं ग्रामीण क्षेत्रों से तो लाते हैं। जहां प्रकृति भी बची थी और श्रमाधारित संस्कृति भी। लेकिन आज जलवायु ही नहीं, अर्थव्यवस्था भी बदल जाने से प्रकृति का विनाश और उससे  ग्रामीणों के साथ शहरवासियों को भी वंचना भुगतनी पड़ रही है। इसका सबसे भयावह उदाहरण है नर्मदा का। पानी, पानी करते आवेदन देते बड़वानी के लोग अगर समझेंगे कि इस वंचना की नीव में क्या है, कारण क्या है तो ही वे बच पाएंगे। महिलाओं ने मटके फोड़े, किसानों ने सूखी नहरों में पानी छोड़ने की मांग रखी, लेकिन गहराई में उतरकर देखना बाकी है। राजनेताओं,सामाजिक कार्यकतार्ओं, हर संवेदनशील व्यक्ति, अधिकारी, कर्मचारियों को भी। 
क्यों सूख रही है मां नर्मदा 
बड़वानी शहर को घाटी का हिस्सा रहे गांव और पुनर्वसित विस्थापितों को भी करोड़ों रुपए खर्च करके बनाए गए नए बसाहट आदि में रखा जा सकता है। यहां जो पंप आदि हैं, वो गर्मियों में काम नहीं कर रहे हैं। कारण है नर्मदा का सूखना। एक ओर सरदार सरोवर बांध 138.68 मीटर तक बढ़ाया जा रहा है जिसमें 67000 करोड रुपए सरदार सरोवर निगम का खर्च हुआ। जबकि मूल लागत मानी गई थी 4200 करोड़। दूसरी ओर नर्मदा का जलस्तर नीचे गया है। गर्मी में भी 110-105 मीटर के नीचे जल स्तर जा रहा है। यह कई क्रियाकलापों का नतीजा है। सबसे पहला कारण है अवैध याने बिना परवाना, बिना मयार्दा, बिना शर्त अंधाधुंध रूप से चल रहा रेत खनन। 2010 की केंद्रीय मंत्रालय से गठित विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर सर्वोच्च अदालत का फैसला 2012 में आया था। इसमें कहा गया था कि रेत खनन से भूमि के नीचे का जलस्तर बर्बाद होता है। तो नदी सूखेगी नहीं, यमुना सूखी, जिसे बचाने के लिए उपवासकर्ता स्वामी निगमानंद ने इसी का विरोध करते हुए जान गवायी। नर्मदा उसी के रास्ते बह रही है। 
कोख से खनन करने वालों को न डर, न चिंता 
बड़वानी में नर्मदा किनारे जो कृषि भूमि, आबादी, शासकीय भूमी थी, वह  सरदार सरोवर के लिए ही अर्जित थी, उसमें कार्यपालन यंत्री, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के नाम होते हुए भी खुदाई कौन कर सकता है? कोई विभाग न लाइसेंस दे सकता है, न मंजूरी। 6/5/2015 का मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश है बड़वानी, धार, अलीराजपुर, खरगोन के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को। फिर भी किसी को न डर है, न चिंता किसी कार्यवाही की। नर्मदा घाटी के किसानों की फसलें, मूंग की हो या चने की अधिक बर्बाद होती रही है। पाइप लाइने तोड़-फोड़कर खननकर्ता अपनी कमाई कर रहे हैं। जिनकी जो जमीन आंदोलन के कानूनी-मैदानी संघर्ष से अर्जित हुई, उन पर मालिकाना हक न होते हुए भी लाखों रुपयों में रेत माफियाओं को उन्हें बेचा जा रहा है। इसमें बड़वानी के पूंजीनिवेशक भी शामिल है। सेंधवा से इंदौर तक के वाहन मालिक हैं और हर स्तर पर कार्यरत, हर रास्ते पर खड़े मजदूर हैं। ड्राइवर, ट्रेक्टर्स, डम्पर्स, जेसीबी, पोकलेन मशीनें नदी किनारे और नदी के जलाशय के जल में भी उतारी जा रही हैं। 
क्या यह तर्क संगत है? 
तमाम कानून, आदेश और 2022 तक के राज्य शासन के आदेशों का उल्लंघन करते। लेकिन न पुलिस, न राजस्व, न खनिज और नर्मदा घाटी विकास की भी नजरें इन पर गिरती हैं। कोई कार्यकर्ता नर्मदा बचाने की कटिबध्दता के साथ पीछे पड़े तो भी संबंधित अधिकारी, कार्यालय से ही खननकतार्ओं को खबर पहुंच जाती है। इस कार्य में दलित, आदिवासी, गरीब बच्चे, युवा रोजगार पा रहे हैं। कुछ किसान भूमिमाता और नदीमाता से रिश्ता तोड़कर, मां को भी बेच रहे हैं कमाई के लिए। इस वाहन पकड़ने पर रेत ले जाने वाले खुलेआम कहते हैं कि आखिर वेही तो पुलिस और अन्य विभागों को हिस्सा देते हैं। एक महाविद्यालय की पढ़ाई छोड़कर इसमें उतरा युवा कहता है कि आखिर रोजगार नहीं मिलता, तो मैं क्या करूं? रोजगार की गारंटी के रिकॉर्ड की जांच करें तो वे दावे झूठे साबित होते हैं। लेकिन क्या हत्या की सुपारी रोजगार बन सकती है? रोज एक गांव से 100 -200 ट्रैक्टर्स यानी प्रत्येक की 3.5 से 4 टन तक रेत निकाली जा रही है। रेत की कमाई करोड़ों की है, लेकिन रुपए बटोरकर कितना अमूल्य नुकसान हो रहा है। ये नुकसान करोड़ों नहीं अमूल्य है जो जिंदगी भर ग्रामीण और शहरी की जनता को भुगतना पड़ेगा। 
आश्वासन, दावे या धोखा 
जलवायु परिवर्तन से बाष्पीकरण से बड़े जलाशयों का, नहरों का पानी उड़ रहा है। लेकिन घाटी के हक का पानी, उससे भी ज्यादा पूरी 1312 किलोमीटर की नर्मदा और उपनदियों से दसौ  बड़ी उद्वहन परियोजनाएं उड़ाके ले जा रही है। लिंक की लाभ-हानि जांचे तो पता चलता है क्षिप्रा को, मालवा को, अब रतलाम को भी पानी का आश्वासन राजनीतिक धोखाधड़ी साबित हो रही है। अभी भी कई परियोजनाओं से नर्मदा की घाटी से बाहर पानी ले जाना बाकी है। रेत खनन से खाली होती आंचल गाद से भरेगा तो इससे कितना पानी बचेगा, क्या जल स्तर रहेगा। जल जीवन मिशन का दावा, नहरों से सिंचाई का आश्वासन कैसे पूरा होगा। गर्मियों में जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उन्हीं महीनों में प्यासी रखकर भूमाता के साथ अन्नदाता किसानों के साथ भी खिलवाड़ हो रही है। यह और भी गंभीर बनती जाएगी। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण कोई पानी की मात्रा ध्यान में न लेते हुए एकेक बड़े, मझौले बांधों को और उद्वहन परियोजनाओं को बढ़ोतरी दे रही है। अधिकारी, कर्मचारी इससे अपनी चाकरी तो बचा पाएंगे लेकिन किसान, मजदूर, शहरवासी अपनी आजीविका और जीवन भी कैसे बचाएंगे? 
-आलेख (प्रथम भाग) 
मेधा पाटकर
(प्रसिद्ध पर्यावर्ण विद् एवं संस्थापक नर्मदा बचाओ आंदोलन)  

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