रतलाम में हर साल निकल रहा 34.55 टन ई-कचरा, लेकिन संग्रहण केंद्र 0 - रोज 10.35 टन प्लास्टिक भी बड़ी चुनौती
रतलाम जिले में कचरा प्रबंधन की गंभीर तस्वीर सामने आई है। जिला पर्यावरण योजना के अनुसार जिले में हर साल करीब 34.55 टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है, लेकिन ई-कचरा संग्रहण केंद्रों की संख्या शून्य है। वहीं रोजाना 10.35 टन प्लास्टिक कचरा निकल रहा है, जिसमें अकेले रतलाम शहर का हिस्सा 8.77 टन है। ग्रामीण क्षेत्रों से भी प्रतिदिन करीब 7.18 टन प्लास्टिक कचरे का अनुमान है। रिपोर्ट में ई-वेस्ट और प्लास्टिक के संग्रहण, पुनर्चक्रण तथा निस्तारण व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 12 महीने की समयसीमा तय की गई है।
पर्यावरण योजना में सामने आई तस्वीर: शहर में ही रोज 8.77 टन प्लास्टिक कचरा
ग्रामीण क्षेत्रों से भी 7.18 टन प्रतिदिन; ई-कचरे के लिए 12 महीने में व्यवस्था बनाने का लक्ष्य
रतलाम । पूरी दुनिया मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी, फ्रिज, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और दूसरे विद्युत उपकरणों से जीवन आसान बना रही है, लेकिन इसके साथ लगातार ई वेस्ट यानी इनका कचरा और कबड़ा भी बढ़ रहा है। अन्य शहरों में तेजी से इसके निष्पादन की प्रक्रिया संचालित हो रही है, लेकिन रतलाम में अब तक शून्य है। पहले से ई कचरा हर साल बढ़ रहा है और औद्योगिक क्षेत्रों के विस्तार पर बल भी दिया जा रहा है, लेकिन ये कचरा और पहले फैलता प्लास्टिक नई महासमस्या बन सकता है।
सरकारी आंकड़े खुद बताते हैं कि कि रतलाम जिले में करीब 34.55 मीट्रिक टन ई-कचरा प्रतिवर्ष उत्पन्न हो रहा है। इसके बावजूद जिले में किसी भी स्थानीय निकाय यानी नगर निगम या नगर पालिका में एक भी ई-कचरा संग्रहण केंद्र नहीं है। उत्पादकों या उनकी उत्पादक उत्तरदायित्व संस्थाओं द्वारा स्थापित संग्रहण केंद्र की संख्या भी शून्य है। ये बात जिला पर्यावरण योजना में भी सामने आई है कि ये गणना कुल ठोस कचरे की मात्रा पर निर्धारित गुणांक का इस्तेमाल कर निकाली गई है। यानी यह अनुमानित ई-कचरा है न कि ठोस गणना।
फिर ई-कचरा जाएगा कहां?
जिला पर्यावरण योजना में ई-कचरा प्रबंधन के लिए स्थिति और सुधार की जरूरत दोनों स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। फिलहाल चुनौती सिर्फ ई-कचरा पैदा होने की नहीं, बल्कि उसे घर, दुकान और संस्थानों से संग्रहित कर अधिकृत स्थानों तक पहुंचाने की भी है। रिपोर्ट बताती है कि जिले में कोई ई-कचरा संग्रहण केंद्र नहीं है ऐसे में उत्पादकों के अधिकृत सेवा केंद्र मरम्मत के दौरान ई-कचरा एकत्र करने के निर्देश हैं। यानी रतलाम का नजदीकी जिलों के अधिकृत ई-कचरा मैनजमेंट करने वालों से संपर्क जरूर है। लेकिन अब योजना के तहत प्रत्येक शहरी स्थानीय निकाय को अधिकृत पुनर्चक्रणकतार्ओं और विखंडन केंद्रों से व्यवस्थित संपर्क बनाना होगा। इसके लिए 12 महीने की समयसीमा निर्धारित की गई है।
रोज पैदा हो रहा 10.35 टनप्लास्टिक कचरा
ई-कचरे के साथ प्लास्टिक कचरा भी जिले के पर्यावरण प्रबंधन के सामने बड़ी चुनौती है। जिला पर्यावरण योजना के अनुसार रतलाम जिले में कुल 10.35 टन प्रतिदिन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। इसमें रतलाम शहर सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। नगर निगम क्षेत्र में ही 8.77 टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन उत्पन्न होने का आंकड़ा दिया गया है। ये शहरी आंकड़े मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट 2023-24 के आधार पर रिपोर्ट में दर्ज किए गए हैं।
क्षेत्र प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन
रतलाम नगर निगम 8.77 टन
जावरा 0.37 टन
सैलाना 0.31 टन
पिपलौदा 0.35 टन
बड़ावदा 0.27 टन
नामली 0.105 टन
धामनोद 0.10 टन
ताल 0.010 टन
आलोट 0.005 टन
गांवों से भी रोज 7 टन से ज्यादा प्लास्टिक
प्लास्टिक का दबाव सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। पहले गांवों में ये न के बराबर होता था, लेकिन अब शहरी निकायों में आंकड़ा बढ़ा है। रिपोर्ट में जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी प्लास्टिक कचरे का अनुमान दिया गया है। इन ग्रामीण विकासखंडों से मिलाकर करीब 7.18 टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन का अनुमान सामने आता है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण आंकड़े ठोस कचरे के 3 प्रतिशत गुणांक पर आधारित अनुभवजन्य सूत्र से निकाले गए हैं।
रतलाम विकासखंड 1.58 टन प्रतिदिन
जावरा 0.96 टन प्रतिदिन
सैलाना 0.74 टन प्रतिदिन
बाजना 1.49 टन प्रतिदिन
आलोट 1.63 टन प्रतिदिन
पिपलौदा 0.78 टन प्रतिदिन
प्लास्टिक संग्रहण की भी अधूरी व्यवस्था
नगर निगम रतलाम में ई कचरा तो ठीक प्लास्टिक कचरा प्रबंधन में भी कई कमियां चिन्हित की गई हैं। रिपोर्ट में घर-घर से सूखे कचरे, जिसमें प्लास्टिक भी शामिल है, का संग्रहण आंशिक बताया गया है। यानी बाकि कचरा सड़कों, नालियों, नालों में ही पड़ा है। इसे मजबूत करने के लिए निगरानी बढ़ाने और बाकी क्षेत्रों को शामिल करने के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाने की जरूरत बताई गई है। नगर निगम क्षेत्र में एक प्लास्टिक कचरा संग्रहण केंद्र मौजूद है, लेकिन उसकी क्षमता और उपयोगिता को बेहतर करने की जरूरत बताई गई है। दूसरी ओर एक निस्तारण इकाई मौजूद है, लेकिन स्थानीय निकाय के पास अपनी पुनर्चक्रण सुविधा नहीं है और प्लास्टिक अपघटन संयंत्र भी नहीं है। यानी जो कचरा आ भी रहा है, उसका ठोस हल नहीं हो रहा।
कंपनियों की जिम्मेदारी भी जुड़नी है
प्लास्टिक को व्यवस्थित तरीके से अलग करने के लिए नगर निगम क्षेत्र में एक सामग्री पुनर्प्राप्ति केंद्र चालू है और 61 कचरा बीनने वाले पंजीकृत बताए गए हैं। लेकिन रिपोर्ट में प्लास्टिक पुनर्चक्रणकतार्ओं और संबंधित एजेंसियों के साथ और बेहतर संपर्क बनाने की जरूरत बताई गई है। प्लास्टिक कचरे के मामले में जिला पर्यावरण योजना केवल नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं मानती। रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्पादक और ब्रांड स्वामी वर्तमान में पैकेजिंग कचरे के संग्रहण में शामिल नहीं हैं। इसके लिए नगर निगम को उत्पादकों, ब्रांड स्वामियों अथवा उनकी उत्पादक उत्तरदायित्व संस्थाओं से संपर्क स्थापित करने की कार्रवाई करनी है। इसके लिए 12 महीने का लक्ष्य दिया गया है।
प्लास्टिक पर प्रतिबंध, फिर भी कैसे बढ़ रहा कचरा
जिला पर्यावरण योजना में यह भी दर्ज है कि मध्यप्रदेश सरकार ने 24 मई 2017 के आदेश के तहत सभी प्रकार के पॉलीथिन कैरी बैग के निर्माण, भंडारण, परिवहन, बिक्री, खरीद और उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है। स्थानीय निकायों और जिला प्रशासन को निरीक्षण, जब्ती और उल्लंघन करने वालों पर जुमार्ने की कार्रवाई के निर्देश हैं। लेकिन कचरा बढ़ रहा है जो बताया है कि प्लास्टिक वेस्ट पर कोई रोक नहीं लग रही है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक को पुनर्चक्रणकतार्ओं तक पहुंचाया जाए। कम मूल्य वाले प्लास्टिक का उपयोग सड़क निर्माण में किया जा सकता है, जबकि पुनर्चक्रण योग्य नहीं होने वाले प्लास्टिक को सीमेंट संयंत्रों में सह-दहन के लिए भेजा जा सकता है।
गांवों में कचरे से निपटने की स्थिति और बुरी
ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति और कमजोर दिखाई देती है। जिले के सभी छह विकासखंडों के लिए रिपोर्ट में बताया गया है कि सूखे कचरे सहित प्लास्टिक की घर-घर से संग्रहण व्यवस्था आंशिक है। इसके अलावा ग्रामीण विकासखंडों में— कचरा स्थानांतरण केंद्र नहीं, सामग्री पुनर्प्राप्ति केंद्र नहीं, पंजीकृत कचरा बीनने वाले नहीं, प्लास्टिक कचरा पुनर्चक्रणकर्ता नहीं, प्लास्टिक कचरा संग्रहण केंद्र नहीं है।