मालवा की नदियों में घुलता 'धीमा जहर': NGT के आदेश के बाद भी फाइलों में कैद है शिप्रा और मलेनी का उद्धार

"रतलाम की शिप्रा और मलेनी नदियाँ प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। एनजीटी (NGT) ने इसे 'मानव वध' जैसा अपराध बताया है, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण सिंहस्थ 2028 तक भी पानी शुद्ध होना मुश्किल लग रहा है। पढ़िए newsmpg.com की विशेष रिपोर्ट।"

मालवा की नदियों में घुलता 'धीमा जहर': NGT के आदेश के बाद भी फाइलों में कैद है शिप्रा और मलेनी का उद्धार
Ratlam River Pollution
मालवा की नदियों में घुलता 'धीमा जहर': NGT के आदेश के बाद भी फाइलों में कैद है शिप्रा और मलेनी का उद्धार

रतलाम। मालवा में नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। रतलाम की मलेनी और शिप्रा नदी में बढ़ते प्रदूषण पर एनजीटी (NGT) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सख्त आदेश पारित किए हैं। लेकिन 3-4 साल बीत जाने के बाद भी आदेशों का पालन इतनी धीमी रफ्तार से हो रहा है कि आने वाले सिंहस्थ 2028 तक इन नदियों का पानी आचमन योग्य बनाना भी मुश्किल दिखाई देता है।

आमतौर पर शिप्रा का नाम आते ही उज्जैन का ध्यान आता है, लेकिन इस पावन नदी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रतलाम जिले के आलोट क्षेत्र से होकर गुजरता है। वहीं, जावरा-पिपलौदा क्षेत्र की सबसे बड़ी मलेनी नदी अब केवल कचरे का वाहक बनकर रह गई है।

Ratlam Shipra River Pollution at Alot

"आगामी पीढ़ी को भुगतनी होगी लापरवाही की कीमत"

शिप्रा की स्थिति पर एनजीटी ने इसे 'मानव वध' और 'हिंसक अपराध' के रूप में देखा है। कोर्ट का मानना है कि यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके गंभीर परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने होंगे। कोर्ट ने रतलाम प्रशासन को ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के साथ ही कई अन्य कड़े निर्देश दिए हैं, लेकिन धरातल पर बदलाव की गति बेहद सुस्त है।

"280 किमी का सफर और तीन साल का संघर्ष"

पर्यावरणविद् सचिन दवे ने इस दिशा में एक बड़ी पहल की। उन्होंने इंदौर (उद्गम) से लेकर आलोट के शिप्रा संगम (शिपावरा) तक 280 किमी की रिक्षा अध्ययन यात्रा की। तीन वर्षों के गहन अध्ययन के बाद उन्होंने एनजीटी में याचिका दायर की। इस कानूनी लड़ाई में उन्होंने चार जिलों (उज्जैन, इंदौर, देवास और रतलाम) के कलेक्टरों सहित 28 पक्षकार बनाए। लगातार सुनवाई के बाद भी प्रशासन के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। 

"कागजों पर एक्शन प्लान, जमीन पर अतिक्रमण"

2023 में ही एनजीटी ने निर्देश दिए थे कि नदी के उद्गम से अंत तक सीमांकन किया जाए और बहाव क्षेत्र के 100 मीटर के भीतर किसी भी तरह का अतिक्रमण न होने दिया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी नदी के किनारों पर रसूखदारों का कब्जा है। ड्रोन कैमरों की जांच में साफ हुआ है कि ग्रामीण कचरे और अवैध निर्माणों ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

"पीलिया खाल: जावरा की मलेनी नदी के लिए 'साइलेंट किलर'"

Ratlam Maleni River Pollution Piliya Khal Jaora

केवल शिप्रा ही नहीं, मलेनी नदी की स्थिति और भी बदतर है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2024 में इसे आधिकारिक तौर पर 'प्रदूषित नदी खंड' घोषित किया है। जावरा शहर का अनट्रीटेड सीवेज और फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल 'पीलिया खाल नाले' के जरिए सीधे नदी में मिल रहा है।

चूँकि मलेनी एक गैर-बारहमासी नदी है, इसलिए गर्मी में पानी सूखने पर यह जहर जमीन के अंदर रिसने लगता है। इससे क्षेत्र का भूजल (Groundwater) भी जहरीला हो रहा है, जो भविष्य में एक बड़े स्वास्थ्य संकट का संकेत है।

Report By- Aditi Mishra

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