नर्मदा विस्थापितों के हक पर कोर्ट सख्त, आखिर क्यों कोर्ट ने सरकारी एजेंसियों को लगाई फटकार

सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित हजारों परिवार अब भी बेघर हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को फटकार लगाते हुए भूखंड, रजिस्ट्री, अनुदान और बैकवॉटर लेवल पर जवाब मांगा है।

नर्मदा विस्थापितों के हक पर कोर्ट सख्त, आखिर क्यों कोर्ट ने सरकारी एजेंसियों को लगाई फटकार
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भोपाल@newsmpg।   30-35 तो कुछ 10 सालों से बेघर हैं और उन्हें ठोस जवाब भी नहीं मिल रहा। अब यह नहीं चलेगा, इतनी धीमी रफ्तार से काम नहीं हो सकता। सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित लोगों के घर और जमीन के हक को लेकर चल रहे प्रकरण में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से साफ कहा है कि अब देरी नहीं चलेगी—विस्थापितों को उनका हक समय पर देना ही होगा।

पर्यावरणविद् और कार्यकर्ता मेधा पाटकर और उनके साथी 40 वर्षो से भी अधिक समय से विस्थापन और पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं। 

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के सामने तथ्य आया कि हजारों परिवार आज भी अपने पक्के घर से वंचित हैं। आंकड़ों के मुताबिक करीब 25 हजार प्रभावित परिवारों में से 15,330 को जमीन के कागज दिए गए है। लेकिन सिर्फ 2,095 परिवारों की ही रजिस्ट्री हो पाई। यानी आज भी करीब 23 हजार परिवार अधर में हैं। यह मुद्दा सिर्फ घर का नहीं, बल्कि पर्यावरण और जीवन से भी जुड़ा है। 

धीमी रफ्तार पर कोर्ट नाराज

कोर्ट ने इस धीमी रफ्तार पर नाराजगी जताई और कहा कि काम तेजी और तय समय सीमा में पूरा किया जाए। साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को समन्वय की जिम्मेदारी देकर प्रक्रिया को आसान बनाने की बात कही गई है। सुनवाई में यह भी सामने आया कि कई परिवार आज भी टीनशेड या सरकारी इमारतों में रह रहे हैं, जहां न तो पर्याप्त पानी है, न साफ-सफाई और न ही बुनियादी सुविधाएं। कई लोगों को अब तक जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला, जिससे वे अपना घर भी नहीं बना पा रहे हैं। कोर्ट को बताया गया कि बैकवॉटर लेवल (डूब क्षेत्र) के सही आकलन में गड़बड़ी के आरोप हैं, जिससे कई परिवारों को डूब से बाहर बताकर उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि इन सभी पहलुओं पर साफ और लिखित जवाब दिया जाए, ताकि लोगों को न्याय मिल सके।

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इन मुद्दों पर मांगा जवाब

कोर्ट ने साफ किया कि इन सभी बातों पर भी जिम्मेदार एजेंसियों को जवाब देना जरूरी है। जिन परिवारों को अब तक जमीन नहीं मिली वो कितने हैं। रजिस्ट्री में हो रही देरी के कारण क्या है और कब तक रजिस्ट्री हो जाएंगी। अस्थायी जगहों पर रह रहे लोग कितने हैं। जमीन के लेन-देन में गड़बड़ी की शिकायतें क्यों आ रही हैं। उनपर जांच और कार्रवाई का ब्यौरा क्या है। घर बनाने के लिए मिलने वाला 5.80 लाख का अनुदान मिल रहा है या नहीं। बैकवॉटर लेवल का सही निर्धारण क्यों नहीं हो रहा है। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ने पर प्रशासन और प्रभावित लोगों के बीच फिर से बैठक करने को भी कहा गया है। 

एजेंसियों की भूमिका पर सवाल

सुनवाई में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की भूमिका पर भी सवाल उठे। आरोप है कि आंकड़ों में ही फर्क है। कहीं भूखंडों की संख्या ज्यादा बताई जा रही है, तो कहीं कम। कोर्ट ने सभी पक्षों को 29 जून 2026 से पहले जवाब देने के निर्देश दिए हैं। पर्यावरण विद् मेधा पाटकर के साथ ही टीम सदस्य भगवान सेप्टा, हेमेन्द्र मंडलोई, राहुल यादव ने मीडिया से चर्चा में कहा कि सख्ती से उम्मीद है कि अब विस्थापितों को उनका हक जल्द मिलेगा और वर्षों से चल रही परेशानी खत्म होगी।

नेहरू से मोदी तक चला बांध का सफर

सरदार सरोवर बांध गुजरात राज्य के नर्मदा जिले के केवडिया में स्थित एक विशाल कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण बांध है । इसकी आधारशिला 5 अप्रैल, 1961 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा रखी गई थी, लेकिन निर्माण कार्य में देरी हुई और प्रमुख कार्य 1987 में शुरू हुआ। इस बांध का आधिकारिक उद्घाटन और राष्ट्र को समर्पित करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 17 सितंबर, 2017 को किया गया था।

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