ये दबदबा , ये हुकूमत ये नशा ए दौलत किराएदार है सब घर बदलते रहते है, आलोट के विधायक डॉ चिंतामणि मालवीय ने सोशल मीडिया पर किसके लिए पोस्ट की ये पंक्तियां
मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय एक राजनीतिक खींचतान चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां दोनों नेता एक ही विचारधारा से निकले हैं, लेकिन अब उनके राजनीतिक रास्ते एक-दूसरे के आमने-सामने आते नजर आ रहे हैं। एक तरफ राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं, तो दूसरी तरफ आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय।
भोपाल/ उज्जैन / रतलाम
एमपी गोस्वामी
बेकल उत्साही की गजल का एक शेर है
‘‘ वो अपने हाथ का
पत्थर बदलते रहते है।
इधर भी अहल ए जुंनू
सर बदलते रहते है।
ये दबदबा , ये हुकूमत
ये नशा ए दौलत
किराएदार है सब
घर बदलते रहते है।
यही पंक्तिया अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आलोट के विधायक और उज्जैन के
पूर्व सांसद डॉ चिंतामणि मालवीय ने पोस्ट की है। माना जा रहा है कि विधायक डॉ मालवीय ने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव पर ये तंज कसा है।
भोपाल/ उज्जैन / रतलाम । मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी सियासी खींचतान चर्चा के केंद्र में है, जिसमें दोनों चेहरे एक ही विचारधारा की पाठशाला से निकले हैं, लेकिन अब राजनीतिक राहें आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही हैं।
एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव तो दूसरी ओर आलोट से भाजपा विधायक डॉ चिंतामणि मालवीय। दोनों का संबंध मालवा-उज्जैन अंचल, संघ और विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से रहा है, मगर पिछले कुछ समय से दोनों नेताओं के बीच की तल्खी खुलकर सामने आ रही है।
सिंहस्थ 2028 बना टकराव का टर्निंग पॉइंट
सियासी रिश्तों में दरार की सबसे बड़ी वजह बनी सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के लिए उज्जैन में प्रस्तावित जमीन अधिग्रहण। सरकार इसे महाकुंभ की विशाल तैयारियों का हिस्सा बता रही थी, लेकिन विधायक चिंतामणि मालवीय ने विधानसभा के भीतर ही अपनी सरकार की लैंड पूलिंग योजना पर सवाल खड़े कर दिए।
मालवीय ने इसे किसान विरोधी करार देते हुए आरोप लगाया कि किसानों की बेशकीमती जमीनें स्थाई रूप से छीनी जा रही हैं और किसान भय में जी रहा है। यह बयान सीधे मुख्यमंत्री के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर सवाल माना गया।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हुई कि अपनी ही सरकार पर खुला हमला करने के कारण पार्टी संगठन ने उन्हें कारण बताओ नोटिस थमा दिया, लेकिन मालवीय झुकने के बजाय और मुखर होते दिखाई दिए।
जब विश्वविद्यालय के बंगले से बढ़ गई राजनीतिक गर्मी
सियासी तनाव ने नया मोड़ तब लिया, जब उज्जैन स्थित विक्रम विश्वविद्यालय प्रशासन ने सरकारी आवास खाली करने के नोटिस जारी किए। सूची में चिंतामणि मालवीय का नाम भी सामने आया।
इसके बाद मालवीय ने ऐसा बयान दिया, जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि नैतिक सवाल तो यह भी है कि मुख्यमंत्री ने स्वयं कुलपति का बंगला लिया हुआ है, हम तो उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। इस बयान को भाजपा के भीतर एक बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा गया, यानी अब असहमति बंद कमरों तक सीमित नहीं रही।
कांग्रेस ने भी पकड़ा मौका
भाजपा के भीतर की इस तनातनी को विपक्ष ने भी हाथों हाथ लिया। लैंड पुलिंग बिल के समय कांग्रेस नेताओं ने मालवीय के समर्थन में बयान देकर सरकार पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि असहमति की आवाज दबाई जा रही है। इससे यह विवाद केवल भाजपा की अंदरूनी लड़ाई न रहकर प्रदेश की बड़ी राजनीतिक बहस बन गया। अब जैसे ही मीडिया रिपोर्ट में डॉ मालवीय के खिलाफ खबरे आने लगी। कांग्रेस ने विधायक और भाजपा को निशाने पर ले लिया है।
अब नया मोर्चा: जमीन और होटल का मामला
मई 2026 में विवाद ने फिर नया मोड़ लिया, जब चिंतामणि मालवीय पर उज्जैन में महाकाल मंदिर पार्किंग से जुड़ी सरकारी जमीन को निजी बताकर होटल प्रोजेक्ट से जोड़ने के आरोप सामने आए। मामला जांच एजेंसियों और अदालत तक पहुंचने की चर्चा में है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम स्थिति जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।
आखिर क्यों अहम है यह अदावत?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह सिर्फ दो नेताओं का व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि मालवा क्षेत्र में भाजपा की अंदरूनी शक्ति-संतुलन की कहानी भी है। एक तरफ मुख्यमंत्री के रूप में मोहन यादव की राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश है, तो दूसरी तरफ चिंतामणि मालवीय खुद को बेबाक और दबाव में न झुकने वाले नेता की छवि में स्थापित करते दिख रहे हैं। सवाल अब यही है, क्या यह तनातनी समय के साथ शांत होगी, या फिर मालवा की राजनीति में डॉक्टर बनाम डॉक्टर की यह जंग आगे और दिलचस्प मोड़ लेगी?