अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले गुरु के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को योगी सरकार ने थमाया नोटिस, पूछा आप शंकराचार्य कैसे?
प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अनशन जारी। योगी प्रशासन ने 'शंकराचार्य' पदवी पर उठाया सवाल, थमाया नोटिस। जानें क्या है 'क्रांतिकारी गुरु' स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की विरासत और क्यों गरमाया है यह धार्मिक विवाद। पढ़िए पूरी रिपोर्ट NewsMPG पर।
- तीसरे दिन भी अनशन पर बैठे संत? कई अन्य संतों ने किया
अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन
धार्मिक डेस्क प्रयागराज। प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन स्नान को लेकर संत और सत्ता के बीच शुरु हुआ विवाद बढ़ता ही जा रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और वे लगातार तीसरे दिन भी अनशन पर बैठे हैं। उनके मठ का कहना है कि मामला केवल एक स्नान का नहीं रहा, बल्कि अब यह "शंकराचार्य" की पदवी और गरिमा की लड़ाई बन चुका है।
इस विवाद ने आज तब सबसे उग्र रूप ले लिया जब प्रयागराज प्रशासन ने एक विवादास्पद नोटिस जारी कर दिया। प्रशासन ने सीधे पूछा— "जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है, तो आप खुद को शंकराचार्य कैसे लिख रहे हैं?" इस नोटिस ने भक्तों के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। इसे केवल एक कानूनी नोटिस नहीं, बल्कि एक संत की धार्मिक पहचान पर सीधा हमला माना जा रहा है।
गुरु जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी लड़ाई
खास बात यह है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस गद्दी (ज्योतिष पीठ) का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसका मध्य प्रदेश से गहरा नाता है। उनके गुरु, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती सिवनी में जन्मे और झोतेश्वर में समाधि है। वे भारत के इकलौते ऐसे पदवी धारी संत थे जिन्होंने 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में जेल की सजा काटी थी। इसलिए उन्हें क्रांतीकारी गुरु के नाम से भी जाना जाता है। जीवन भर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती धर्म रक्षा को लेकर मुखर रहे और कई बार सत्ता से टकराते रहे।
इतिहास का पन्ना: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने 1990 में तत्कालीन सरकारों के सामने राम मंदिर बनाने की मांग को लेकर यात्रा निकाली थी। इस मुद्दे पर सरकार ने उन्हें रोका, तो वे नहीं माने और उन्हें जेल भेज दिया गया था। यहां भी स्वामी जी ने अनशन कर दिया था। आजादी की लड़ाई में जेल जाने वाले 'क्रांतिकारी साधु' स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती अक्सर कहा करते थे— "धर्म की रक्षा के लिए अगर सरकार से भी टकराना पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।" आज वही तेवर उनके शिष्य में दिख रहे हैं, जो संगम की रेती पर अन्न-जल त्याग कर बैठे हैं।
भक्तों में सेहत को लेकर सवाल, आक्रोश
गुरु की उसी 'क्रांतिकारी' विरासत को आगे बढ़ाते हुए, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज भी काफी वक्त से मुखर हैं। विशेषकर तीन दिन पहले हुए धक्का मुक्की, बाल पकड़कर मारपीट के बाद से वे अनशन पर बैठ गए हैं। इसे लेकर देशभर में सोशल मीडिया से लेकर अब प्रयागराज तक भक्त भी मुखर हो रहे हैं। कई भक्तों ने इसे सत्ता का अहंकार करार दिया है तो कुछ स्वामी जी की सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं। स्वामी जी की मांग है कि मेला समिति व्यवहार के लिए माफी मांगे।
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प्रशासन का 'पदवी' पर प्रहार
इस बीच मंगलवार को विवाद और बढ़ गया है कि जब प्रयागराज प्रशासन ने एक विवादास्पद नोटिस उनके शिविर के बाहर चस्पा कर दिया है। इसमें लिखा है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है, तो आप खुद को शंकराचार्य कैसे लिख रहे हैं? इस नोटिस ने भक्तों के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। भक्तों का कहना है कि इस तरह की तनातनी से सनातन परंपराओं का सम्मान कम हो रहा है।
समर्थन में आए कई संत
विवादों के बीच देशभर के कई प्रमुख अखाड़ों और संतों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया है। काशी विद्वत परिषद के सदस्यों और स्थानीय संतों ने कहा है कि एक सन्यासी को संगम स्नान से रोकना सनातन परंपराओं का सीधा अपमान है। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर (झोतेश्वर) और अन्य क्षेत्रों के साधु-संतों ने स्वामी जी के स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की है। अखाड़ा परिषद ने भी कहा है कि इस मामले का हल जल्द बातचीत से निकलना चाहिए। इस तरह के मामले पूरे विश्व के सामने सनातन पंरपरा के सम्मान को प्रभावित करते हैं।
कब और क्यों शुरु हुआ विवाद
यह विवाद मुख्य रूप से 18 जनवरी 26 (मौनी अमावस्या) को शुरू हुआ। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों और पारंपरिक पालकी के साथ संगम में शाही स्नान के लिए जा रहे थे। परंतु प्रयागराज मेला प्रशासन और पुलिस ने उन्हें मुख्य मार्ग पर ही रोक दिया। कारण बताया कि करोड़ों की भीड़ थी। प्रशासन का तर्क था कि पालकी के साथ मुख्य मार्ग से जाना सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक हो सकता है। प्रशासन चाहता था कि वे एक निर्धारित छोटे रास्ते से जाएं, जबकि स्वामी जी अपनी पारंपरिक गरिमा के साथ मुख्य मार्ग से जाने पर अड़े थे।
दोनों पक्षों के गंभीर आरोप
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने "शंकराचार्य पद" की गरिमा का अपमान किया है। उन्हें उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों (स्नान करने की आजादी) से रोका गया। व्यवहार दुर्व्यवहारपूर्ण था। संतों के साथ धक्कामुक्की और मारपीट हुई। प्रशासन का कहना है कि स्वामी जी ने सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने की कोशिश की।